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डिअर मोने…
किसी पुरानी सी इमारत पे
पल पल बदलती धूप-छाँव देखता हुँ
तो तुम्हारी ही याद आती है…
तुम्हारे ब्रश से निकले अनगिनत रंगों के स्ट्रोक्स
सामने दिखने लग जाते हैं…
वो जो स्टेशन में आती रेल का धुँवा तुम ने देखा वो
मेरे स्टुडिओ के मेज पे रखी
तुम्हारी चित्रों की किताब से बाहर आता दिखता है मुझे कई बार….
सुज़ैन की पेन्टिंग बनाई थी तुमने ,
हाँ वहीं…धुप में छतरी लिए वो खड़ी है जिसमें..
उस वक्त खुली हवा जो लहरा रही थी उसके आसपास
मै महसूस कर सकता हूँ बिल्कुल आज भी..
और महसूस कर सकता हु उस वक्त के धूप की गर्माहट…
पल पल बदलती धूप छाँव में बेशुमार रंग ढूंढे तुमने…
कुछ पल की जिंदगी जीने वाली वाटरलिली को
एक उम्र बख़्श दी तुम ने…
डिअर मोने…
पानी पे तैरती धूप तुम्हारे कैनवास पे वैसीही तैर रही है….
पेड़ो पत्तों के बीच से गुज़रते जमीन पे बगीचे में रखे मेज पे…
और..वो पेड़ के छाँव में बैठे किताब पढ़ती कैमिली,
उसके कपड़ों पे भी अभी तक वो धूप के टुकड़े थरथरा रहें है वैसेही जैसे 1872 के बसंत ऋतु में तुम्हारे ब्रश से उतरे थे..
रंगों को आँखोंमें समेटते तुम्हारी आँखे थक गई जब…
आंखों की रोशनी बुझने लगी..
फिर भी तुम पैलेट पे रंगों की रोशनी ढूंढते रहे ..
ये कैसी जिजीविषा थी तुम में..
डिअर मोने
समय को तुम ने बदलती रोशनी के ज़रिए चित्र में तब्दील किया…
और
वो सब चित्र एक सिम्फनी बन गए …
समय की सिम्फनी…
धूप छाँव की सिम्फनी…
रंगों की सिम्फनी..
लगातार देख रहे है लोग सालों साल वो सिम्फनी…
डिअर मोने….
©अन्वरहुसेन2019

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