Wednesday, 31 March 2021

क्या तुम्हें पता है विन्सेन्ट


क्या तुम्हें पता है विन्सेन्ट
किंवदंती बन गए हो तुम तो
फ़िल्मे बना रहे है लोग 
तुम्हारी जिंदगी पर
किताबें लिख रहे है
कविताएँ लिखी जाती है तुम पर
चित्रों का विषय बन रहे हो तुम
तुम्हारी चित्रों का विश्लेषण कर कर
तुम्हे जानने की कोशिशें चल रहीं हैं 
म्यूजियम में तुम्हारे चित्र देखने के लिए
क़तारें लग जाती है 
भावविभोर हो जाते है तुम्हारे चाहनेवाले
आँखे भर आती है 
जब रूबरू होते है तुम्हारी पेंटिंग्स के
कहना जो चाहा था तुम ने 
वो दृश्यसंगीत लोग सुन पा रहें है अब
जिन जिन जगहों को तुमने कैनवास पे रंग दिया
वहां जा कर रोमांचित हो जाते  है लोग
ब्रैंड बन गए हो तुम एक
पता है तुम्हे.. रंग बिक रहें है तुम्हारे नाम से 
महेंगे है लेकिन
तुम शायद ही खरीद पाते
कितनी जद्दोजहद की थी 
रंगों और कैनवास के लिए तुमने
सोचता हूँ, कि तुम कैसा महसूस करते
अगर तुम्हारे चित्रों की नीलामी की कीमतें सुनते
चेहरे पर शायद हल्की सी व्यंग्य भरी मुस्कान आ भी जाती
वो दिल चिरने वाली उदास आँखे 
चमक उठती एक पल के लिए
और अगले ही पल अपना इज़ेल कैनवास रंग ब्रश उठा 
तुम चमचमाती धूप के तलाश में निकल पड़ते
तुम्हारे आंखों से रिसता दर्द 
उदास कर देता है 
जब भी तुम्हारे सेल्फ पोर्ट्रेट्स सामने आ जाते है
पढा है मैंने,
पागलपन की हद तक तुम्हारे 
पीली धूप के लिए भटकने के बारे में
और फिर उसे रंगों मे मिलाकर 
बेतहाशा कैनवास पे बिछा देना 
चित्रों में महसूस किया है...
और पढा है
तुम्हारे गहरे अवसाद की अवस्था के बारे में
तुम्हारे एकाकीपन, बेचैनी के बारे मे
उपेक्षा से आहत तुम्हारे मन को
जान सकता हूँ
खबरें आती है
तुम्हारे चित्रों के रेकॉर्ड कीमतों में बिकने की या 
किसी नए फ़िल्म की तुम्हारी जीवनी पे बन रही
कमरे में टंगे तुम्हारे सेल्फ पोर्ट्रेट की तरफ नजर जाती है
तुम्हारी आंखों से रिसता दर्द उदास कर देता है

©अन्वर हुसेन2020

#जनमदिन_मुबारक_विन्सेन्टवैनगोग #30मार्च
#almirah_2007 #soloshow 

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